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दो करोड़ बच्चों का प्रवेश बना टेढ़ी खीर, लॉकडॉउन में आए प्रवासी मजदूर गए शहर तो घट गया नामांकन

दो करोड़ बच्चों का प्रवेश बना टेढ़ी खीर, लॉकडॉउन में आए प्रवासी मजदूर गए शहर तो घट गया नामांकन



लखनऊ : कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन का दौर खत्म हुआ। प्रवासी मजदूर पैसा कमाने निकल लिए तो कुछ नए सिरे से निजी स्कूलों के मुहाने पर फिर से पहुंच गए। सरकारी प्राइमरी स्कूलों में नामांकन का लक्ष्य पूरा करने में मास्टर साहब पसीना बहा रहे हैं, लेकिन लक्ष्य फिर भी पूरा नहीं हो पा रहा है।





इस बार लगभग 20 फीसदी लक्ष्य बढ़ाते हुए दो करोड़ बच्चों को प्रवेश दिलवाना है। बीते वर्ष 1.83 करोड़ बच्चे सरकारी व सहायताप्राप्त स्कूलों में नामांकित थे। हालांकि, विभाग का दावा है कि इस बार 1.87 करोड़ बच्चों का नामांकन हो गया है। जल्द ही यह संख्या दो करोड़ के पार होगी, लेकिन इस बार सबसे बड़ी मुसीबत कोरोना संक्रमण के दौरान बढ़े हुए नामांकन के आगे निकल पाना है। वर्ष 2016-17 में नामांकन 1.52 करोड़ था। वर्ष 2020-21 में कोरोना के कारण हुए लॉकडाउन के कारण 1.73 करोड़ पहुंच गया। वर्ष 2021-22 में यह 1.83 करोड़ पहुंच गया।


30 अप्रैल को जारी आंकड़ों को देखें तो बढ़ा हुआ लक्ष्य पाने में वाराणसी, जौनपुर, देवरिया, भदोही, झांसी, गाजीपुर ही सफल रहे हैं। वहीं 33 जिले ऐसे हैं, जहां लक्ष्य 70 फीसदी भी पाया नहीं जा सका है। महोबा, गोंडा, गोरखपुर, बलरामपुर मैनपुरी में 50 फीसदी तक पहुंचे है।



प्रवासी मजदूर गए शहर, घट गया नामांकन

कोरोना संक्रमण के दौरान लगे लॉकडाउन के कारण प्रवासी मजदूर अपने घरों को लौटे थे। उनके बच्चों को स्कूल तक लाया गया। वहीं निजी स्कूलों की पूरी फीस जमा करने में असमर्थ अभिभावकों ने भी सरकारी स्कूलों का रुख किया। मिड डे मील के नाम पर मिलने वाला खाद्य सुरक्षा भत्ता और यूनिफार्म, जूते, मोजे आदि के लिए दी जाने वाली धनराशि भी इसका एक कारण बनी। अब प्रवासी मजदूर शहरों की ओर लौट चुके हैं। वहीं निजी स्कूल भी पूरी तौर पर खुल चुके हैं। लिहाजा लोगों की दिलचस्पी सरकारी स्कूलों में कम है।



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