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PrimaryKaMaster: यूपी : पुरानी पेंशन बहाली की घोषणा पर सियासत हुई तेज, शिक्षकों और कर्मचारियों में जगी उम्मीदें, सोशल मीडिया पर शुरू है पक्ष विपक्ष में बहस

यूपी : पुरानी पेंशन बहाली की घोषणा पर सियासत हुई तेज, शिक्षकों और कर्मचारियों में जगी उम्मीदें, सोशल मीडिया पर शुरू है पक्ष विपक्ष में बहस


 
सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की ओर से पुरानी पेंशन बहाली की घोषणा को लेकर सियासत तेज हो गई है। शिक्षकों और कर्मचारियों का एक वर्ग इस घोषणा को उम्मीदों भरी नजर से देख रहा है। साथ ही इसे कर्मचारी संघर्षों की जीत बता रहा हैं। वहीं बड़ी संख्या ऐसे शिक्षकों और कर्मचारियों की भी है, जो इसे महज चुनावी घोषणा मान रहे हैं।


पुरानी पेंशन बहाली के लिए अटेवा की ओर से राष्ट्रव्यापी आंदोलन चलाया गया।  शिक्षकों और कर्मचारियों के अलग-अलग संगठनों की ओर से भी आंदोलन जारी है। इन आंदोलनों के बीच सपा की ओर से पुरानी पेंशन की बहाली की घोषणा से राजनीतिक गलियारे के अलावा शिक्षकों एवं कर्मचारियों के बीच भी बहस शुरू हो गई है। अटेवा का कहना है कि अभी तक राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे से दूरी बना रखी थी। अखिलेश यादव की घोषणा से उम्मीद जगी है। उनका कहना है कि हालांकि मुलायम सिंह यादव के समय में ही नई पैंशन लागू हुआ था। ऐसे में कई तरह के सवाल है लेकिन अब शिक्षकों और कर्मचारियों का दबाव बढ़ गया है। इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि सपा वादा पूरा करेगी।





सोशल मीडिया पर शुरू है बहस

पुरानी पेंशन को लेकर सोशल मीडिया पर भी बहस छिड़ गई है। शिक्षकों के एक ग्रुप पर जारी बहस में एक वर्ग अखिलेश यादव की घोषणा के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है तो कई विरोध में हैं। शिक्षकों का कहना है कि सांसद रहते हुए योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य भी इसकी वकालत कर चुके हैं लेकिन सरकार बनने के बाद दोनों नेता इसे भूल गए। अब अखिलेश यादव ने भी वही तीर छोड़ा है। तमिलनाडु में डीएमके ने भी चुनाव से पहले पुरानी पेंशन लागू करने का वादा किया था लेकिन सरकार बनने के बाद धन की कमी बताकर मामला केंद्र के हवाले कर दिया गया।


कर्मचारी, शिक्षक, अधिकारी पेंशनर्स अधिकार मंच के वरिष्ठ प्रदेश उपाध्यक्ष राजेंद्र त्रिपाठी का कहना है कि अखिलेश यादव की घोषणा का हम स्वागत करते हैं पेंशन राज्य का मुद्दा है। इसलिए उम्मीद करते हैं कि यह व्यवस्था लागू होगी। 


वहीं शिक्षक नेता तथा भाजपा राष्ट्रीय प्रशिक्षण अभियान के शैलेष पांडेय इसे सिर्फ चुनावी घोषणा मानते हैं। शैलेष का कहना है कि केंद्र में 2004 में अटल सरकार के समय NPS लागू हुआ। इसके बाद सबसे पहले उत्तर प्रदेश में यह लागू हुआ और उस समय मुलायम सिंह यादव की सरकार थी। इसके अलावा 2016 में अखिलेश यादव सरकार में आंदोलन के दौरान लाठीचार्ज में शिक्षक की मौत हो गई थी। शैलेष का यह भी कहना है कि शिक्षकों और कर्मचारियों की ओर से पुरानी पेंशन की लगातार मांग की जा रही है। इसी का दबाव है कि NPS में जमा होने वाली सरकार की हिस्सेदारी को 10 से बढ़ाकर 14 प्रतिशत कर दिया गया है। कई अन्य संशोधन भी किए गए हैं।



पुरानी पेंशन के लिए अपने शासनकाल में क्यों खामोश रहे अखिलेश? सवाल उठाया बीजेपी ने

लखनऊ। पुरानी पेंशन योजना को लागू करने के सपा के चुनावी वादे पर उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा ने कहा कि यह 'उल्टा चोर कोतवाल को डांटे' वाली कहावत चरितार्थ करती है। उन्होंने कहा कि यूपी में नई पेंशन स्कीम को मुलायम सिंह के नेतृत्व में सपा सरकार ने ही लागू किया था। 

उन्होंने सवाल उठाया कि जब जनता ने सपा को 2012 से 2017 तक राज करने का मौका दिया था, तब तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव क्यों इस मुद्दे पर खामोश रहे। बयान में कहा कि झूठे वादों से गुमराह करने की सपा की चाल को शिक्षक और कर्मचारी बखूबी समझ रहे हैं। 

शर्मा ने कहा कहा, सपा सुप्रीमो को शिक्षकों व कर्मचारियों को यह भी बताना चाहिए कि अपने पांच साल के कार्यकाल में उन्होंने योजना में सरकार का दस हजार करोड़ रुपये का अंशदान क्यों जमा नहीं किया था। योगी सरकार के आने के बाद सपा सरकार के कार्यकाल का बकाया अंशदान भी भाजपा सरकार ने जमा कराया। उन्होंने कहा कि कुछ विपक्षी दल वादों का सब्जबाग दिखाकर जनता को भ्रमित करने की कोशिश कर रहे हैं।



मुलायम सरकार ने किया NPS लेने को मजबूर 

लखनऊ। राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद के अध्यक्ष जेएन तिवारी ने शुक्रवार को फेसबुक पर कर्मचारियों के साथ लाइव संवाद किया। इसमें उन्होंने कहा कि अगर वर्ष 2005 में मुलायम सरकार ने कर्मचारियों को एनपीएस लेने को मजबूर न किया होता तो आज प्रदेश के कर्मचारियों को पुरानी पेंशन मिल रही होती। उन्होंने कहा कि पुरानी पेंशन के अलावा भी कर्मचारियों की समस्याएं हैं।

वेतन विसंगति, आउटसोर्सिंग, संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण और महंगाई भत्ते के एरियर का भुगतान जैसे मुद्दे भी ज्वलंत हैं। इन पर भी सपा मुखिया को खुलकर बात करनी चाहिए। उन्होंने दावा किया कि आंकड़ों के हिसाब से एनपीएस योजना काफी लोकप्रिय है। इस योजना में पिछले वर्ष 97 लाख लोग जुड़े हैं। अब तक इस योजना से कुल 4.63 करोड़ लोग जुड़ चुके हैं। 


पुरानी पेंशन बहाली से कर्मचारियों को मिलेगी राहत, घोषणा का किया स्वागत

लखनऊ। राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद की शुक्रवार को हुई वर्चुअल बैठक में सपा की ओर से सत्ता में आने पर पुरानी पेंशन बहाली की घोषणा का स्वागत किया गया। पदाधिकारियों ने कहा कि सपा ने इस मुद्दे को घोषणा पत्र में शामिल कर कर्मचारियों को बड़ी राहत दी है।

परिषद के अध्यक्ष सुरेश रावत, महामंत्री अतुल मिश्रा व प्रमुख उपाध्यक्ष सुनील यादव ने कहा कि पुरानी पेंशन बहाली के लिए परिषद ने लगातार आंदोलन किया । परिषद निजीकरण और आउटसोर्सिंग के स्थान पर स्थायी नियुक्तियों की वकालत करता रहा है। परिषद ने सपा सरकार के समय आउटसोर्सिंग और संविदा कर्मियों के लिए स्थायी नीति बनाने की मांग की थी, जिसे तत्कालीन सरकार ने बनाई भी थी, लेकिन वर्तमान सरकार ने लागू नहीं किया। यही स्थिति कैशलेस इलाज की रही। बैठक में बेसिक हेल्थ वर्कर एसोसिएशन के अध्यक्ष धनंजय तिवारी भी शामिल हुए। ब्यूरो


स्वास्थ्यकर्मियों ने राजनीतिक दलों को लिखा पत्र

एनएचएम कर्मचारी संघ के महामंत्री योगेश उपाध्याय ने सभी राजनीतिक दलों को पत्र लिखकर स्वास्थ्य कर्मियों की समस्याओं को अपने घोषणा पत्र में शामिल करने की मांग की है। उन्होंने बताया कि एनएचएम में विभिन्न श्रेणियों में एक लाख से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं। इन्हें अल्प मानदेय दिया जाता है। प्रदेश अध्यक्ष डॉ अनिल गुप्ता ने एनएचएम में कार्यरत कर्मचारियों को नियमित करने अथवा राज्य कर्मचारियों की तरह समान कार्य का समान वेतन देने की मांग की।


मुलायम के समय बंद हुई थी पुरानी पेंशन

प्रदेश में पुरानी पेंशन योजना को 2005 में बंद कर नई पेंशन योजना (एनपीएस) लागू की गई थी। उस समय केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार और राज्य में मुलायम सिंह यादव की सपा सरकार थी। जब नई पेंशन योजना लागू की गई उस समय कर्मचारी इसे समझ ही नहीं पाए। ऐसा लगा था मानों नई योजना में जब कर्मचारी सेवानिवृत्त होंगे तो उन्हें मोटी धनराशि के साथ ही अच्छा खासी पेंशन मिलेगी। यह भ्रम पिछले तीन चार साल पहले टूटा है।



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