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शनिवार, 18 दिसंबर 2021

हाईकोर्ट : छात्राओं को भी मातृत्व अवकाश जैसे लाभ का अधिकार, जानें पूरा मामला

हाईकोर्ट : छात्राओं को भी मातृत्व अवकाश जैसे लाभ का अधिकार, जानें पूरा मामला


प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि विभिन्न संवैधानिक न्यायालयों द्वारा तय किए गए कानून के तहत बच्चे को जन्म देना महिला का मौलिक अधिकार है। किसी भी महिला को उसके इस ‌अधिकार और मातृत्व सुविधा देने से वंचित नहीं किया जा सकता है।



 कोर्ट ने एपीजे अब्दुल कलाम विश्वविद्यालय लखनऊ द्वारा अंडर ग्रेजुएट छात्राओं को मातृत्व लाभ देने के लिए नियम नहीं बनाने की निंदा करते हुए विश्वविद्यालय को इस संबंध में नियम बनाने का निर्देश दिया है, जिसमें छात्राओं के बच्चे को जन्म देने के पूर्व व जन्म देने के बाद सहयोग करने व अन्य मातृत्व लाभ शामिल हों। साथ ही छात्राओं को परीक्षा पास करने के लिए अतिरिक्त अवसर व समयावधि बढ़ाने के नियम हों। कोर्ट ने विश्वविद्यालय को चार माह में निर्णय लेने के लिए कहा है।


एपीजे अब्दुल कलाम विश्वविद्यालय से संबद्ध कानपुर के कृष्णा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉ‌लाजी की बीटेक छात्रा सौम्या तिवारी की याचिका पर न्यायमूर्ति अजय भनोट ने याची को बीटेक के द्वितीय व तृतीय सेमेस्टर के दो प्रश्नपत्रों में सम्मलित होने के लिए अतिरिक्त अवसर देने का निर्देश दिया है। 


कोर्ट ने कहा कि विश्वविद्यालय छात्राओं को मातृत्व लाभ देने से मना नहीं कर सकता। ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 14, 15(3) और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। विश्वविद्यालय के अधिवक्ता ने कहा कि विश्वविद्यालय में ऐसा कोई नियम नहीं है जिसके आधार पर अंडर ग्रेजुएट छात्रा को मातृत्व लाभ दिया जाए। 


इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि विश्वविद्यालय छात्रा को इस आधार पर मातृत्व संबंधी लाभ देने से इनकार नहीं कर सकता है कि उसने ऐसा कोई नियम, परिनियम नहीं बनाया है। ऐसा करना छात्रा के मौलिक अधिकार का हनन करना होगा। विश्वविद्यालय इस संबंध में नियम बनाने के लिए कानूनन बाध्य है।


विश्चवविद्यालय अनुदान आयोग के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि केंद्र सरकार के निर्देश पर यूजीसी ने सकुर्लर जारी कर देश के सभी विश्चविद्यालयों को छात्राओं को भी मातृत्व संबंधी लाभ दिए जाने को लेकर नियम बनाने के लिए कहा है जबकि एआईसीटीई के अधिवक्ता का कहना था कि उनकी ओर से इस संबंध में नियम बनाने के लिए कोई रोक नहीं है। 


विश्वविद्यालयों के पास खुद के नियम व परिनियम बनाने की शक्ति है जिसका प्रयोग कर वे नियम बना सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि एआईसीटीई सहित अन्य तमाम रेग्युलेटरी बॉडी पीजी छात्राओं को ही मातृत्व संबंधी लाभ देने के नियम बनाने तक सीमित हैं। अंडर ग्रेजुएट छात्राओं के लिए नियम न बनाना अनुच्छेद 14 और 15(3) का उल्लंघन है।


यह है मामला

याची सौम्या तिवारी ने कानपुर के कृष्णा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉ‌लाजी कानपुर में वर्ष 2013-14 के सत्र में बीटेक इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्यूनिकेशन पाठ्यक्रम में दाखिला लिया। उसने सभी सेमेस्टर सफलतापूर्वक पास किए लेकिन तीसरे सेमेस्टर के इंजीनियनिरिंग मैथमैटिक्स के द्वितीय प्रश्नपत्र व ‌द्वितीय सेमेस्टर की परीक्षा में गर्भवती होने व बच्चे को जन्म देने के बाद की रिकवरी के कारण शामिल नहीं हो सकी। इससे उसका कोर्स पूरा नहीं हुआ। उसने विश्वविद्यालय से अतिरिक्त अवसर देने की मांग की जिसे नामंजूर कर दिया गया।


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